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इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

मोला सुनता अउ सुमत ले

ईश्‍वर कुमार

मोला सुनता अउ सुमत ले सुबिचार चाही जी।
ए माटी के जतन करैया, समाज ला बने गढ़ैया।
धरती के रखवार चाही जी, माटी के रखवार चाही जी

पुरखा के बटोरे सबो संस्कृति के मान लावय
छरियाये माटी ला गढ़ के सुघ्घर पहिचान लावय
पबरित माटी ला जनावै फेर जग मा धान कटोरा
ए धरती मां के महिमा गावै बइठार के आरुग चौरा
मोला अइसन मीत मितवा हितवार चाही जी
ए माटी के जतन करैया, समाज ला बने गढ़ैया।
धरती के रखवार चाही जी, माटी के रखवार चाही जी

राजनीती राजधरम ला नित नित नियाव मा धारय
भ्रष्टाचारी काला धन ला जर ले उखान बिदारय
देश के सेवा परहित जिनगी के सांस खपत ले
देश ला संवार के जाहूं अंतस ले इहि सपथ लय
मोला अइसन राज परजा सरकार चाही जी
ए माटी के जतन करैया,समाज ला बने गढ़ैया।
धरती के रखवार चाही जी, माटी के रखवार चाही जी

पाँव कांटा गड़ही तभो ले बिपदा ला राउंडत रेंगय
अड़े राहय सत मारग मा बने गिनहा सौहत देखय
धरम अउ करम ला मानय पुरसारथ करय करावै
दाई ददा सत सियान के मान करके गरब ला पावै
मोला अइसन बेटी बेटा परिवार चाही जी
ए माटी के जतन करैया, समाज ला बने गढ़ैया।
धरती के रखवार चाही जी, माटी के रखवार चाही जी

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