इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

अंधी का बेटा

एक औरत थी, जो अंधी थी। जिसके कारण उसके बेटे को स्कूल में बच्चे चिढाते थे कि अंधी का बेटा आ गया। हर बात पर उसे ये शब्द सुनने को मिलता था कि अन्धी का बेटा। इसलिए वह अपनी माँ से चिड़ता था। उसे कही भी अपने साथ लेकर जाने में हिचकता था उसे नापसंद करता था।
उसकी माँ ने उसे पढ़ाया और उसे इस लायक बना दिया की वह अपने पैरो पर खड़ा हो सके। लेकिन जब वह बड़ा आदमी बन गया तो अपनी माँ को छोड़ अलग रहने लगा।
एक दिन एक बूढ़ी औरत उसके घर आई और गार्ड से बोली - मुझे तुम्हारे साहब से मिलना है। जब गार्ड ने अपने मालिक से बोल तो मालिक ने कहा कि बोल दो मैं अभी घर पर नही हूँ। गार्ड ने जब बुढ़िया से बोला कि वह अभी नही है ... तो वह वहां से चली गयी!!
थोड़ी देर बाद जब लड़का अपनी कार से ऑफिस के लिए जा रहा होता है तो देखता है कि सामने बहुत भीड़ लगी है और जानने के लिए कि वहां क्यों भीड़ लगी है वह वहां गया तो देखा उसकी माँ वहां मरी पड़ी थी।
उसने देखा की उसकी मु_ी में कुछ है उसने जब मु_ी खोली तो देखा की एक लेटर जिसमें यह लिखा था कि बेटा जब तू छोटा था तो खेलते वक्त तेरी आँख में सरिया धंस गयी थी और तू अँधा हो गया था तो मैंने तुम्हे अपनी आँखे दे दी थी।
इतना पढ़ कर लड़का जोर - जोर से रोने लगा। उसकी माँ उसके पास नहीं आ सकती थी।
दोस्तों वक्त रहते ही लोगों की वैल्यू करना सीखो। माँ - बाप का कर्ज हम कभी नहीं चूका सकते। हमारी प्यास का अंदाज भी अलग है दोस्तों, कभी समंदर को ठुकरा देते हंै, तो कभी आंसू तक पी जाते है ..!!!
बैठना भाइयों के बीच,
चाहे बैर ही क्यों ना हो,
और खाना माँ के हाथो का,
चाहे जहर ही क्यों ना हो...!!

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