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गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

धन धन रे मोर किसान

द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र

धन धन रे मोर किसान, धन धन रे मोर किसान।
मैं तो तोला जांनेव तैं अस,भुंइया के भगवान।।

तीन हाथ के पटकू पहिरे, मूड़ म बांधे फरिया
ठंड गरम चउमास कटिस तोर, काया परगे करिया
अन्न कमाये बर नई चीन्हस, मंझन, सांझ, बिहान।
धन धन रे मोर किसान, धन धन रे मोर किसान।
मैं तो तोला जांनेव तैं अस,भुंइया के भगवान।।

तरिया तिर तोर गांव बसे हे, बुड़ती बाजू बंजर
चारो खूंट मां खेत खार तोर, रहिथस ओखर अंदर
रहे गुजारा तोर पसू के खिरका अउ दइहान।
धन धन रे मोर किसान, धन धन रे मोर किसान।
मैं तो तोला जांनेव तैं अस,भुंइया के भगवान।।

बड़े बिहनिया बासी खाथस, फेर उचाथस नांगर
ठाढ़ बेरा ले खेत जोतथस, मर मर टोरथस जांगर
तब रिगबिग ले अन्न उपजाथस, कहाँ ले करौं बखान।
धन धन रे मोर किसान, धन धन रे मोर किसान।
मैं तो तोला जांनेव तैं अस,भुंइया के भगवान।।

तैं नई भिड़ते तो हमर बर कहाँ ले आतिस खाजी
सबे गुजर के जिनिस ला पाथन, तैं हस सबले राजी
अपन उपज ला हंस देथस, सबो ला एके समान।
धन धन रे मोर किसान, धन धन रे मोर किसान।
मैं तो तोला जांनेव तैं अस,भुंइया के भगवान।।

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