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गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

डॉ. पीसीलाल यादव के कविता म पीरित अउ पीरा के आरो

 - यशपाल जंघेल

 जब हमन छत्तीसगढ़ी कविता के इतिहास के गोठ करथन, त हमर मंझोत म छत्तीसगढ़ी लोकगीत आके ठाढ़ हो जथे। सिरतोन म लोकगीत ह, लिखित साहित्य के पुरखा आय। तभे त हिंदी के जब्बर आलोचक रामचंद्र शुक्ल ह अपन प्रसिद्ध निबंध Ó कविता क्या है ?Ó म लिखे हे - ÓÓ मनुष्य के लिए कविता इतनी प्रयोजनीय वस्तु है, कि संसार की सभ्य असभ्य सभी जातियों में किसी न किसी रूप में पायी जाती है।ÓÓ( चिंतामणि भाग-1, पृष्ठ-108) शुक्लजी के ईशारा लोकगीत कोति हे। कोनो भी देस या अंचल के समृद्धि के पता उहां के साहित्य ले चलथे। साहित्य चाहे लिखित होय कि मौखिक होय। छत्तीसगढ़, लोकसाहित्य म तो बड़हर हवेच, अब धीरे - धीरे लिखित साहित्य के कोठी घलो सीग होवत जात हे।
छत्तीसगढ़ी कविता के भंडार के श्रीवृद्धि म गंडई के साहित्यकार डा. पीसीलाल यादव के घलो बड़ योगदान हवय। बालसाहित्य के छोड़े अभी तक उंकर कविता के पांच ठन संघरा छप के आगे हें - मोर गाँव के कोरा (2003), सुरता के सुतरी (2009), काम बर उरा परसाद बर पूरा (गजल संग्रह-2012), पिरकी ह घाव होगे (2015)अउ महिनत म मोती मिलय (2016)। पीसीलाल यादवजी के गीत के एक - एक सब्द मन मया - पीरित के रंग म बुड़े हवय। मया - पीरित के अनभो तो सबो मनखे करथें, फेर साहित्यकार मन आने मनखे ले जादा संवेदनसील होथें, ओकरे सेती ओमन चुप रहे नई सकें अउ अपन जिनगी के अनभो ल कागद म उतार लेथें। यादवजी जब सुरता के सुतरी म एक घांव अरझथे त, सरलग अरझथे जाथे अउ अइसे अरझथे कि वोहा निकले नई पाय। कवि ह निकले उदीम घलो नई करंय। अब सवाल उठथे काकर सुरता ? ये सुरता मयारूक भर के नोहे। ये सुरता आय गांव के, पीपर के छांव के, गली - खोर के, अमराई, भाठा, पटपर, चिरई - चुरगुन, खेत - खार, रूख - राई, तरिया, नदिया अउ ओ हर जिनिस के जेमा कवि के बालपन के स्मृति बसे हे।
साहित्य के इतिहास ल देखन त नायक - नायिका बर कई ठन प्रतीक अउ उपमान रूढ़ हे जइसे चंदा - चकोर, फूल - भौंरा, मेघ -चातक,  सुरूज - कमल। यादवजी मन ये पंरपरागत प्रतीक अउ उपमान मन ल अपन गीत म बउरेच हें, संगेसंग नवा प्रतीक अउ उपमान घलो खोजे हें -
ÓÓ मया तोर लटके हे गर के फाँसी कस।
मन ल मिलायेंव नून अऊ बासी कस।।ÓÓ
(सुरता के सुतरी,पृष्ठ -04)
यादवजी अपन गीत म जउन मया के गोठ करथें, ओहा आरूग मया ए। ओमा वासना के नांव तक नई हे। कवि ह मया के सार्थकता, मन ले मन के जुरे ल मानथें -
ÓÓ गाड़ी के जुड़ा सुमेला जोता।
मन ले हे मन के नता गोता।।ÓÓ (मोर गाँव के कोरा, पृष्ठ-41 )
गीत म लोकजीवन ले जुड़े ठेठ  छत्तीसगढ़ी सब्द के बउरे ले छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति जीवंत होगे हे। कवि ह छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति के आत्मा ले परिचित हें। ऊंकर गीत मन लोकगीत के निच्चट लकठा म हेें। या दूसर सब्द म कहन त छत्तीसगढ़ी लोकगीत के विकास हमन ल पीसीलाल यादव के गीत म देखे ल मिलथे। उंकर गीत मन लोकगीत सन अइसे मिंझर जथें, जइसे चटनी सन बासी।
छत्तीसगढ़ी के बड़का कवि डा. जीवन यदु जी ठंउका लिखे हे -Ó संसार ल सिरजे म मया - पीरित के बड़ हाथ हे। मया - पीरित नई होतिस,त ये दुनिया नई होतिस। मया - पीरित वाला कविता ह भाई पीसीलाल यादव के माई चिन्हारी आय। इही ओकर असल पहिचान आय।Ó( महिनत म मोती मिलय, भूमिका, पृष्ठ-06 ) ये धियान देके के बात आय कि ऊंकर कविता म आए मया - पीरित ह सिरिफ  नायक - नायिका के बीच के नोहे,बल्कि ये मया - पीरित ह मनखे - मनखे के बीच के आय। कवि के मया भरे गीत मन नायक - नायिका के सांकुर खोर ले निकल के सामाजिक जीवन के बड़का भाठा म दऊंड़थें -
ÓÓमँय मोंगरा अंगना भर ल ममहावत रेहेंव,
तंय निरदई टोर के अकेल्ला सूँघ डारे।ÓÓ (सुरता के सुतरी पृष्ठ-08)
ये गीत ल पढ़त खानी जयशंकर प्रसाद के कहिनी Ó आकाशदीपÓ के ठुक ले सुरता आ जथे। जब हिरदे म मया उपजथे त पाछू पीरा घलो जनम लेथे। अउ पीरा के कोख ले हरूवाथे गीत ह। तांहन ये समझ नई आय कि मया बर पीरा हे कि पीरा बर मया। तभे त छत्तीसगढ़ी के बड़े कवि अउ समीक्षक डॉ. विनय कुमार पाठक ह लिखे हें- ÓÓ छत्तीसगढ़ी कविता,पीड़ा की कोख में जन्मी और प्रेम के पर्यंक में पली है।(भूमिका, सुरता के सुतरी) कवि ल मयारूक संग भेट म तो सुख मिलबे करथे, वियोग के पीरा म घलो ओहर सुख खोज लेथें। महादेवी वर्मा कस पीरा ल सकेलत कवि कहिथें -
Ó संसो के आगी म, जिनगी ल जोरत हँव।
कंगलिन कस पीरा के,धन ल बटोरत हँव।।ÓÓ
(सुरता के सुतरी, पृष्ठ-36)
कवि के मन म राजनीतिक - व्यवस्था ले उपजे पीरा घलो हमाए हे। अनियाव अउ सोसन ल देखथें, त कवि चुप नई रहे सकें। अनियाव, सोसन, लबारी, अतियाचार के पुरा के आय ले कवि के धीरज केे  बांधा फुट जाथे अउ पीरा म तरमरावत ओहर कहिथें -
ÓÓ गुड़ के सवाद ल बतावथे कोंदा।
सिंघासन म माढ़े, माटी के लोंदा।ÓÓ
(काम बर पूरा परसाद बर उरा, पृष्ठ-42)
जब कवि के संयम टूटथे, त कभू - कभू कवित्व के हिनमान घलो हो जथे। पीसीलाल यादवजी के कविता म घलो अइसना कई घांव होय हे। उही पाय के हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी के पोठ आलोचक डॉ. गोरेलाल चंदेल ह लिखथें-ÓÓ शोषक और शोषितों के बीच के फर्क को वह ( डॉ.पीसीलाल यादव ) कई गीतों में उजागर करते हुए चलते हैं। इन दोनों वर्ग के अंतर को खोलने में कवि इतने मगन हो जाते हैं कि भावों की आवृत्तियों का भी सुध नहीं रह जाता।ÓÓ
(पिरकी ह घाव होगे भूमिका, पृष्ठ-05)
यादवजी के पीरा के पाग म पगे कविता मन ल पढ़त खानी पाठक मन ल जयदेव,विद्यापति,सूरदास,घनानंद जइसे महाकवि मन के घेरी - भेेरी सुरता आथे। मैथिली कवि, विद्यापति लिखथें कि कृष्ण के वियोग म राधा ह लकड़ी म खुसरे ओ कीरा सहीं होगे हे, जेकर दूनो छोर म आगी ढिलाए हे। इही भाव के कविता महाकवि सूरदास घलो लिखे हें - ÓÓ सुनो स्याम! यह बात और कोउ क्यों समझाय कहै। दुहुँ दिसि की रति बिरह बिरहिनी कैसे कै जो सहै।ÓÓ (सूरदास, पृष्ठ-564) ए कोति यादवजी लिखथें -
ÓÓ तन मोर सुक्खा लकड़ी, पीरा भँवारी होगे, .............
आँखी म बसे - बसे, पीरा मोटियारी होगे।ÓÓ
(सुरता के सुतरी पृष्ठ-11)
यादवजी के कविता मन कोनो कोति ले कपाए अस नई दिखें। उंकर कविता म छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति के जम्मों तत्व मन ल अपन व्यापकता के संग देखे अउ अनभो करे जा सकथें। कविता तो सदादिन मनखे ल करम करे बर आगू डहर बढ़ाए के उदीम करथे, फेर जब हमन छत्तीसगढ़ी कविता के समकालीन परिदृष्य ल देखथन, त अनभो करथन कि छत्तीसगढ़ी कविता ह आजो चटनी - बासी, मोर मयारू किसान, मोर गंवई - गांव अउ गांव के सनसी - कोलकी मन म भटकत हे। छत्तीसगढ़ी के बहुत कम कवि मन अपन कविता ल ये सनसी - कोलकी ले निकालके मानुखपन के ऊंचहा भूंईया म पहुंचाय हें। कवि डॉ. पीसीलाल यादव मन अपन कविता म कई ठन जुन्ना रूंधना - बंधना मन ल टोरे के उदीम करे हें। कवि ह समाज के ओ मनखे मन सन खड़े दिखथें, जेमन सोसित हें, पीड़ित हें, अपन अधिकार तक ल नई जानत हें। कवि अतियाचार के प्रतिरोध के गोठ करथें। सोसित मनखे मन ल कभू डोमी नाग कस फुफकारे ल कहिथें, त कभू गोल्लर कस खुरखुंद मताए ल कहिथें-
ÓÓसोके सपना देखे त का ?
अरे! जाग के सपना देख.......
कब तक रहिबे पिटपिटी बने ?
डोमी नाग के सपना देख।ÓÓ (पिरकी ह घाव होगे, पृष्ठ-39-40)
Ó छत्तीसगढ़िया, सबले बढ़ियाÓ येहर छत्तीसगढ़िया मन ल भुलवारे के नारा आय। कवि ह एकरो परछो पा गेहें। ओमन लिखथें -
ÓÓधरके आए फूटहा लोटा,
चुहक- चुहक के गरीब के पोटा।ÓÓ(पिरकी ह घाव होगे, पृष्ठ-43)
कवि ह एके कोति भर ल नई सरेखें। ओमन जम्मों डहर ले समस्या के विस्लेसन करथें,तब कोनो ठाहिल निस्कर्स म पहुंचथें। कवि ह सोसन के कारन सिरिफ  सासक वर्ग ल नई मानें, बल्कि एमा सोसित वर्ग के कमजोरी मन ल घलो ऊजागर करत चलथें -
ÓÓ सगा ह सगा ल, देवथे अब दगा
Ó बेंठÓ टंगिया, ÓमुठियाÓ आरा-आरी के।ÓÓ
(पिरकी ह घाव होगे, पृष्ठ-65)
तइहा बेरा म राजनीति ह साहित्य के पाछू म रेंगे, फेर अब समे बहुत बदल गे। अब साहित्य ह राजनीति के रागी होगे हे।Ó संतन को कहा सीकरी सों कामÓ अइसन सोचइया कवि बहुत कम हें। ए बात के अनभो आचार्य रामचंद्र शुक्ल बहुत पहिली कर डरे रहिस। ओकरे सेती ओमन अपन इतिहास ग्रंथ Ó हिंदी साहित्य का इतिहासÓ (1929) म केहे हें-ÓÓ साहित्य को राजनीति के ऊपर रहना चाहिए, सदा उसके ईशारों पर ही न नाचना चाहिएÓÓ(पृष्ठ-357) यादवजी राजनीति के पाछू दऊंड़या मनखे नोहे। बल्कि ओहा तो सश्रा म पैठू खुसरे मनखे मन ल ललकारत कहिथें -ÓÓदेस में बड़ करलई हे,
दही के रखवार बिलई हे।ÓÓ( पिरकी ह घाव होगे, पृष्ठ-34)
साहित्य के इतिहास म एक दौर प्रगतिवादी आंदोलन के चलिस। ओ समे के कवि मन अनियाव अउ सोसन के खिलाफ  मुअखरा विरोध भर नही,ं बल्कि लाठी - बेड़गा उठाय के गोठ घलो करिन। प्रगतिवादी विचारधारा ले प्रभावित कई ठन कविता यादवजी लिखे हें -
ÓÓसोसन के मुड़ी म पथरा कचार,
मनखे होके तैं झन हो लचार।ÓÓ(पिरकी ह घाव होगे, पृष्ठ-29)
फेर ये किसिम के कविता मन म कवि के विचार हावी हो जथे। अउ जब कविता म कवि के विचार मन जोर मारे ल धर लेथें, त कविता ह, कविता नई रहिके सिरिफ नारा होके रहि जथे। कवि के विचार म सामाजिक यथार्थ तोपा जथे। बल्कि कविता म सामाजिक यथार्थ अउ कवि के विचार के उचित संतुलन होना चाही।
यादवजी के अनुसार कवि के जिनगी अउ लेखन म कोनो अंतर नई होना चाही। कविता के ये दू डांड़ ल पढ़के, पाठक मन कवि के पूरा रचना - प्रक्रिया के गम पा सकत हें -
ÓÓ जइसे लिखथस, तइसनेच् दिख,
अउ जइसने दिखथस, तइसने लिख।ÓÓ(पिरकी ह घाव होगे,पृष्ठ -102)
डॉ. पीसीलाल यादव के कविता मन ल कोनो भी विचारधारा म छांदे - बांधे नई जा सके। उंकर कविता म कभू भक्तिकालीन उपदेसात्मकता मिलथे, त कभू द्विवेदीयुगीन इतिवृश्रात्मकता, कभू छायावादी प्रेम - संवेदना मिलथे, त कभू प्रगतिवादी चेतना। उंकर कविता म पीरित अउ पीरा के सुंदर संगम मिलथे। पीसीलाल यादव के कविता के जर मन ह लोकजीवन के हिरदे तक समाय हें, जिहां ले ओला मया - पीरित के रस सरलग मिलत रहिथे। उंकर कविता ह नार - बेयार कस ढलगे मनखे मन बर ढेखरा कस खड़े होथे। उंकर कविता ह अनियाय के मुड़ी म पखरा अस गिरथे।

सहायक शिक्षक
पी.एस. - बैगा साल्हेवारा
जिला - राजनांदगाँव (छ.ग.)
मोबा. - 9009910363

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