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गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

नरेश मेहता के उपन्यास Ó यह पथ बन्धु थाÓ में लोक सांस्कृतिक परिदृश्य के विविध रुप


- शोधार्थी आशाराम साहू

उपन्यास, साहित्य की प्रमुख विधाओं में सबसे आधुनिक है। उपन्यासों में प्राय: जीवन और संस्कृति का समावेश होता है, इसी कारण वह लोक संस्कृति का वाहक बनता है। यह अवश्य है कि कथा की मांग के अनुसार किसी उपन्यास में लोक संस्कृति का चित्रण कम होता है और किसी में अधिक। बसाहट की दृष्टि से भारतीय जनसंख्या का दूसरा प्रवर्ग कस्बों,छोटे शहरों,नगरों और महानगरों में निवास करती है, जिसे सुविधा के लिएÓ ग्रामेतरÓ प्रवर्ग की संज्ञा दे दी जानी है। नगरों - कस्बों की पृष्ठभूमि पर रचित सभी उपन्यासों में चाहे उनका केन्द्रीय कथ्य जो भी हो, मध्यवर्ग किसी न किसी रूप में अवश्य विद्यमान है। नगरीय परिवेश में मध्यवर्गीय जीवन, उनके रहन - सहन, लोक संस्कृति के विविध रूपों का अंकन प्रमाणित रूप से नरेश मेहता द्वारा लिखित उपन्यासÓ यह पथ बन्धु थाÓ में देखने को मिलती है, साथ ही साथ पारिवारिक विघटन एवं स्त्री के प्रति अमानवीय क्रूरता का भी बड़ी ही संजीदगी के साथ चित्रण हुआ है, साथ ही एक ईमानदार व्यक्ति के पूरे शासन के प्रति विद्रोह एवं उसकी पराजय की करूण गाथा को मार्मिकता के साथ प्रस्तुत किया है।
चूँकि यह उपन्यास कस्बों एवं नगरों के जनजीवन पर आधारित है, फिर भी उपन्यासकार ने लोक संस्कृति से जुड़े अनेक परिदृश्यों को बड़ी ही रोचकता एवं सजीवता के साथ उभारा है।
ÓÓ दिनभर घानी में पिलकर बैल बाहर बँधा हुआ खली खाता हुआ मिलता। खली की गंध दूर से ही आती जिसके साथ कच्चे तैल की भी चिपचिपाहट होती। घर के सामने कोने में बड़ी सी बावड़ी में कहीं दुबके कबूतरों की गुटरगूँ बहुत गरे से आती लगती।ÓÓ1
इस प्रकार के दृश्यों से जब हमारा सामना होता है तो लगता है जैसे ये सब हमारे आँखो के सामने है, हम उसे देख रहे है, महसूस कर रहे है, उन्हें जी रहे है, ऐसा लगता है ये सारे परिदृश्य हमारे जीवन में आकर समाहित हो गये हो। इसके अलावा नरेश मेहता ने इस उपन्यास में तीज - त्यौहारों, विवाह, मेले, रहन - सहन, खान - पान आदि लोक परंपराओं को भी बखूबी दर्शाया है - ÓÓ घर का सामान झाड़ - पोछकर साफ  किया जा रहा था। इस सबमें बच्चों और स्त्रियों का मन बहुत लगता है। नये चूने के पोते जाने की गंध आ रही थी। छतों, खिड़कियों, दरवाजों, खम्भों की लकड़ियों पर तैल - पानी किया जा रहा था।ÓÓ2
भारत पर्वो एवं त्यौहारों का देश है। यहाँ विभिन्न प्रकार की त्यौहारें मनायी जाती है, और लेखक भली- भाँति इन पर्वो एवं त्यौहारों से परिचित है और उनकी महत्ता से भी। इसी कारण लोक पर्वो एवं त्यौहारों का चित्रण उनके उपन्यासों में बखूबी हुआ है।
ÓÓ फाल्गुन बीत चुका था। चैत्र के आरंभिक दिन थे। रात के गहरे सन्नाटे में दूर कहीं फाग और ढपली के स्वर सुनायी पड़ जाते।ÓÓ3
हमारी भारतीय परंपरा में सोलह संस्कार माने जाते है। जिनमें विवाह संस्कार का विशेष महत्व है। यह एक ऐसा संस्कार है। जिसके लिए हर माता - पिता लालायित रहता है। मंडप सजा होता है, कानों में शहनाईयों की स्वर लहरियाँ गूँजने लगती है, पूरा वातावरण खुशियों से भरा होता है,कुछ ऐसी ही खुशियों का पल आज ठाकुर परिवार में है। श्री धर की छोटी बेटी सुशीला का विवाह होने जा रहा है, उन पर हल्दी का लेप लगाया जा रहा है और महिलायें हँसी - ठिठोली करते हुये गीत गा रही है-
ÓÓ बरेली के बाजार में झुमका गिरा दी!
सास मेरी ढूढ़े
ननद मोरी ढूढ़े
अरे, बलमा ढूँढ़े री!!
बरेली के बाजार में झुमका गिरी दी !ÓÓ4
रात को आँगन में चौक पूरा जाता। सुशीला का श्रृंगार कर औरतें घेर कर बैठ जाती और गीत शुरू हो जाता -
ÓÓ न पकड़ो हाथ मनमोहन
कलाई टूट जायेगी
जवाहर की जड़ी - चूड़ी
हमारी टूट जायेगीÓÓ5
नरेश मेहता जी कुछ वर्ष बंगाल में भी रहे, वहाँ की लोक संस्कृति को भी उसने बड़ी ही मार्मिकता के साथ प्रस्तुत किया है -
ÓÓ बंगाली बाबू आएँ तो बड़ा मजा होवे !
मंदिर वनवावें
शिवाला वनवावें
और हमको बंगला - हो
बंगाली बाबू आवें तो बड़ा मजा होवेÓÓ 6
अर्थात लोक संस्कृति कहीं की भी हो, हमें प्रभावित करती ही है, उसमें प्राय: समानता पायी जाती है।
चूँकि यह नरेश मेहता का महाकाव्यात्मक उपन्यास माना जाता है। इसकी पृष्ठभूमि में लेखक ने और भी कथाएँ गढ़ी है - जो अलग - अलग विजन को साथ लिए चलती है। उन्हीं के शब्दों में जो उन्होंने Ó यह पथ बन्धु थाÓ की भूमिका में कहा था -ÓÓ यह उपन्यास बीसवीं सदी के पूर्वार्ध के सामाजिक जीवन मूल्यों एवं मान्यताओं पर आधारित है। यह युग तथा इसके चरित्र एवं इसकी विशिष्टताएँ अभी - अभी शेष हुई सी है, अतएव स्मृति अधिक है, इतिहास कम। हमारा इनसे अभी भी सायुज्य भाव है, लेकिन अनागत में जब ये इतिहास बन जायेंगे तब इस काल के केवल सफल पुरुष ही स्मरण किये जायेंगे। इतिहास केवल क्रूरों तथा महापुरूषों का ही होता है, जबकि हमारी स्मृतियों में ऐसे अनेक साधारणजन होते हैं जो व्यक्ति भी नहीं बन पाते, केवल संख्या होते है। लेकिन हम जानते है कि ये असफल सामान्य जन इतिहास न हो, महापुरुष न हो, किन्तु मानुष होते है। इतिहास में मात्र संज्ञाएँ सत्य होती है जबकि साहित्य में संज्ञाएँ काल्पनिक। इतिहास सफलता का गौरव देता है जबकि साहित्य केवल मानवता को। इसलिए दोनों में मामूली अंतर यह है कि इतिहास सफलता का चारण है, जबकि साहित्य मानवता का उदगाथा।ÓÓ7
Ó यह पथ बन्धु थाÓ उपन्यास के माध्यम से लेखक ने मध्यम वर्ग के टूटते हुए व्यक्ति एवं उसके पारिवारिक जीवन के विघटन को बड़ी ही मार्मिकता के साथ प्रस्तुत किया है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जहाँ  Ó यह पथ बन्धु थाÓ में बाह्य घटनाओं का विस्तार है वहीं निजी प्रसंगो का समावेश भी।
अगर इस उपन्यास की कथा वस्तु को देखा जाय तो, यह दो भागों में विभाजित है, पहला भाग वह है जिसमें श्रीनाथ ठाकुर का परिवार छिन्न -भिन्न हो रहा है, कलह और अमानवीय हद तक शत्रुता से भरे इस वातावरण में पिसने वाला पक्ष श्रीधर का परिवार है, जिसकी त्रासदी सबसे अधिक सरों और गुनी के माध्यम से व्यक्त हुई है। दूसरे पक्ष में श्रीमोहन और श्रीवल्लभ हैं, जिनकी पत्नियाँ - बँटवारे की जिनकी मांगे - श्रीनाथ ठाकुर को इस विघटन का द्रष्टा मात्र बनाकर छोड़ती है। पूरी परिस्थिति में कोई सबसे अधिक टूटा है तो श्रीनाथ ठाकुर। परिस्थिति के किसी भी हिस्से से उनका लगाव नकारात्मक ही है। श्रीधर जो उपन्यास का एक प्रमुख पात्र है, पेशे से शिक्षक, स्कूल में हिन्दी, इतिहास तथा भूगोल पढ़ाते है। उन्होंने Ó राज्य का गौरवमय इतिहासÓ नाम पुस्तक लिखा था, इसलिए उसे हम इतिहास लेखक भी कह सकते हैं और इसी इतिहास पुस्तक के फलस्वरूप उनके वर्तमान जीवन में उथल - पुथल मच जाता है,क्योंकि उन्होंने श्रीमंत सरकार तथा उनके पूर्वजों का बारंबार उल्लेख करते हुये भी उनके सम्मान में राजकीय सम्बोधनों एवं पदवियों का प्रयोग नहीं किया था जो श्रीमंत सरकार के असंतोष का प्रमख कारण भी था। जिनके एवज में उन्हें नौकरी से त्याग पत्र देना पड़ता है। और यही से शुरूवात होती पारिवारिक विघटन एवं सबंधहीनता का दौर। जब श्रीमोहन जो श्रीधर का बड़ा भाई है, उससे इस संबंध में बात करना चाहता है तो श्रीमोहन की पत्नी उसे टोकते हुए कहती है -ÓÓतुम्हें क्या है ? जाने कैसे किताब लिखी। न लिखते समय, न सरकार की चि_ी आयी उस समय, जब हमसे कुछ पूछा ही नहीं, तब अब हम बीच में क्यों पड़े ? सरकारी मामला है। तुम बीच में मत पड़ना। अपनी नौकरी और बाल - बच्चे भी तो देखने है। अरे, देवर जी की नौकरी ही क्या है, मास्टरी की न ? न होगा दूसरी कर लेंगे। और मान लो न करे कुछ, हमें किसी से क्या ? 8
इस तरह मुसीबत के समय श्रीमोहन अपने भाई श्रीधर का कोई मदद नहीं करता।
स्वयं नरेश मेहता के शब्दों में - यह निपट साधारणजन की दूबगाथा है। इस उपन्यास में मध्यवर्गीय जीवन की पृष्ठभूमि में वैयक्तिक, पारिवारिक और सामाजिक दायरे में होने वाले मूल्यगत विघटन और व्यापक मोहभंग का सशक्त अंकन किया गया है। नेमिचन्द्र जैन के अनुसार - इसमें एक युग के सामाजिक, राजनीतिक जीवन - मूल्यों और मान्यताओं की पृष्ठभूमि में वैयक्तिक जीवन का संवेदनशील और आत्मीयतापूर्ण चित्र है जो भाव संकुल, तीखा और संयत है।9
श्रीधर एक अध्यापक हैं साथ ही अपने भाईयों में सबसे अलग, आदर्शवादी, सिद्धांतवादी और संकोची और इसी आदर्शवाद एवं सिद्धांत की रक्षा के लिए वह एक दिन अपने परिवार को सोता हुआ छोड़कर बिना किसी से कुछ कहे चुपचाप चला जाता है, एक नये परिवेश में। और उस नये परिवेश में जोड़ने के क्रम में निरन्तर टूटता चला जाता है। मूल्य तथा सार्थकता का बहुत बड़ा स्वप्न लेकर चलने वाला व्यक्ति अंत में अपने को चारो - ओर से हारा हुआ अकेला और अजनबी पाता है। प्रखर आलोचक - रामदरश मिश्र लिखते है - ÓÓ यह पथ बन्धु थाÓÓ उपन्यास का पथ अनुभव का है, इसीलिए वही बन्धु है। अनुभव ही बन्धु हो सकता है, सुख का, दुख का। उसके बिना मूल्यवान - से - मूल्यवान दिखने वाली जिन्दगी रीती है।10
श्रीधर और सरस्वती पति - पत्नी है, लेकिन दोनों का जीवन एक वृत्त के समान थे जो एक - दूसरे को छूते तो थे लेकिन काटते नहीं थे। घर छोड़कर जाने के बाद श्रीधर उज्जैन, इंदौर, आदि स्थानों में बारी - बारी ठहरता है और इंदौर में क्रांतिकारियों के संपर्क में आता है परन्तु उनके शांत संस्कार क्रांतिकारी बनने से रोकता है और वह कांग्रेस के कार्यक्रमों में भाग लेकर राजनीति से अपने को जोड़ना अवश्य चाहता है। कुछ राजनीतिक घटनाओं के कारण उन्हें इंदौर छोड़कर बनारस आना पड़ता है। वहाँ उसे परिश्रम करके, प्रकाशक के यहाँ अनुवाद बेचकर कभी साहित्य के प्रतिष्ठित आचार्य की पत्रिका में मुफ्त काम करके जैसे - तैसे गुजारा करना पड़ता है। वहाँ वह प्रकाशकों, साहित्यिकों, प्रतिष्ठित नेताओं के संपर्क में आता है, लेकिन उसे सर्वत्र एक रीतापन, एक भयंकर विसंगति दिखाई देती है। वह हर बार अपने को सार्थक करने के लिए अपने आप को परिवेश से जोड़ना चाहता है, परन्तु हर बार परिवेश की कुरूपता, कठोरता उसे तोड़ जाती है। उसके मन में अखबार निकालने की इच्छा होती है और प्रकाशक के साथ मिलकर मेहनत भी करता है किन्तु अनुभव करता है कि वहाँ भी विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता नहीं है। पैसा शोषण का अस्त्र है, वह चाहे प्रकाशक के हाथ मे हो, चाहे स्वाधीनता की लड़ाई लड़ने वाले ठाकुर साहब जैसे तपे हुऐ नेता के हाथ में हो, चाहे किसी और के हाथ में हो। वह शोषण का अस्त्र बार - बार श्रीधर जैसे ईमानदार, असमझौतावादी, स्वप्नदर्शी व्यक्ति को तोड़ता है और श्रीधर अंत में हारा हुआ, टूटा हुआ आदमी बनकर शेष रह जाता है। श्रीधर के चले जाने के बाद सरो की जिंदगी में दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, वैसे तो वह पहले भी सुखी नहीं थी लेकिन अनाथ भी नहीं थी। श्रीधर के न होने पर भाई - भौजाई को एक तरह से छूट मिल गई और बातों - बातों में सरो को खरी - खोटी सुनाने का मौका भी।
ÓÓ पति की एक छाया होती है जो अनजाने में ही पत्नी, बाल - बच्चों के ऊपर ही ऊपर मौसमों के विभिन्न तापमान स्वयं झेल लिया करती है। पति के पास में न रहने पर आकाश एकदम सिर ऊपर आ जाता है। सारी तपन, सियरापन सभी तो फिर सीधे - सीधे भुगतना होता है ..... यदि आप अपने दारिद्रय में न सही वस्त्र तो घर तो पहने हुए होते हैं, लेकिन सहसा भूकम्प आ जाये और दीवारें ढह जाएं तो, तो क्या हो ? आप निपट न हो जाएँ ?11
सरो की स्थिति भी कुछ ऐसी ही हो गई थी। जेठ - जेठानी आये दिन किसी न किसी बहाने दो - चार सुनाकर ही दम लेते है। सरो का जीवन अब जेठानी सावित्री के लिए किसी हास - परिहास के विषय से ज्यादा कुछ नहीं थी।
ÓÓ बीमार है तो क्या है। और ऐसी क्या बीमारी है ? कोई मोतीझरा निकला है ? जलोदर है क्या ? सन्निपात हुआ है ? क्या हुआ है। कोई पूछे तो जरा इन महारानी से ? कहती है रात को हल्का - हल्का बुखार हड्डियों में हो जाता है। सुनती हो बहना! हड्डियों में बुखार!! हाय - हाय कुरबान जाऊँ ऐसी नजाकत पर। इस देहात में लखनऊ की बेगम साहबा आय गयी बेचारी!12
इस तरह सावित्री रोज - किसी न किसी बहाने सरो को ताना मारती रहती,और खुश रहती। सरो के पास सहन करने के अलावा कोई उपाय भी तो नहीं था। आखिर जल में रहकर कोई मगरमच्छ से बैर करे तो भला कैसे और कब तक ?
इधर गुनी भी अब बड़ी हो गई,कुछ दिनों के बाद उनका विवाह भी तय हो गया। और वो शुभ घड़ी भी बहुत जल्दी आ गई, आज ही तो बारात आने वाली है सारा - घर सगा - संबंधियो से भरा पड़ा है, कहीं एक तिल धरने की भी जगह नहीं है। बारात आगमन के बाद विवाह की सारी रस्में एक - एक करके संपन्न होने लगी - पुरोहित जी जोर - जोर से हवन पाठ पढ़ने लगे
वाजन्त्री सावधान !!
ढोल - नगारा सावधान !!
मंगलगानी - सावधान !!
वर - वधु - सावधान !!13
चौबीस घड़ी सावधान!! इस तरह विवाह के सभी रस्मों के साथ गुनी की विदाई भी हो गई। कुछ दिन तो सब ठीक रहा उसके बाद उनके घरवालों ने दहेज के नाम पर मारना - पीटना शुरू कर दिया और इतना मारा - पीटा की बेचारी लंगड़ी ही हो गई। परिस्थिति कहीं और ज्यादा ना बिगड़ जाये यही सोचकर श्रीनाथ ठाकुर गुनी को उनके ससुराल से वापस ले आये। गुनी की ऐसी हालत को देखकर घर के सभी लोग सदमे में थे।
ÓÓ पूरे परिवार में एक अजीब तरह की घुटन समा गयी थी। सब अपने - अपने ढंग से या तो बीमार, या वृद्ध हो गये थे,या रोगी हो गये थे, या उपेक्षित थेÓÓ14 घर का बँटवारा तो पहले ही हो चुका था,श्रीमोहन ठाकुर अपने परिवार वालों के साथ छावनी वाले मकान में चले गये थे। श्रीवल्लभ तो पहले ही ससुराल में समाधि लगाकर बैठ गये थे। बच गया श्रीधर का परिवार तो सरों, माँ - बापू बच्चे सभी पुराने घर में ही रह रहे थे। श्रीनाथ ठाकुर का परिवार पर ही दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। श्रीधर का अभी तक कुछ पता ही नहीं था, गुनी को लेकर भी घर में सभी दुखी रहने लगे -ÓÓ दुख भी जब रोज का जीवन बन जाता है तब उसका वैशिष्ट्य नष्ट हो जाता है। तब भोक्ताओं की ऐसी मनोदशा हो जाती है कि छोटे - मोटे कष्ट, रोग - ताप तो जैसे अनिवार्य मान लिए जाते है। ऐसी भोक्ताओं को तब तक किसी बात पर आश्चर्य नहीं होता जब तक कि कुछ बहुत बड़ी दुख की बात न हो जाये। और जब सहते - सहते व्यक्ति की यह मनोवृत्ति हो जाती है तब उसे फिर कोई दुख नहीं व्यापता - संभवत: बड़े से बड़ा दुख भी। इसलिए ठाकुर - परिवार को विपन्नताएँ हो सकती थी लेकिन दुख नहीं। दुखों की पराकाष्ठा के बाद दुख नहीं होते।ÓÓ15
दुख की कितनी मार्मिक अभिव्यक्ति यहाँ पर नरेश मेहता ने की है। यहाँ पर हमें वो एक दार्शनिक के रूप में मिलते है- गुनी के माध्यम से वे कहते है - जिजी! जीवन में आंसुओं का मूल्य है न भावना का। केवल सहना ही सत्य है। बिना सहे तो कोई गति नहीं। अपने प्रति भी निर्दय होना पड़ता है जिजी! हम सब सह रहे है। बापू, माँ, तुम, मैं, बाबा सभी तो अपने - अपने ढंग से सह रहे है। दुख किस बात की? बोलने से व्यक्ति कमजोर होता है। इसीलिए मैं चुप रहती हूँ। दुख वाणीहीन होता है। हमें कष्ट नहीं, तकलीफें नहीं है कि उन्हें बँटा ले। दुख वह परमपद है जिजी! जिसे स्वत: ही भोगना होता है। सब व्यर्थ है यहाँ।ÓÓ16
जीवन में सुख - दुख की जो स्थिति है उसे उपन्यासकार ने बड़ी ही वास्तविकता के साथ यहाँ पर प्रस्तुत किया है सुख में तो सहभागिता हो सकती है किन्तु दुख में कोई सहभागिता नहीं होती।
इधर श्रीधर 25 वर्षो के बाद, हारकर, टूटकर अपने घर आता है, तो पाता है सब कुछ जैसे खत्म हो गया हो, पत्नी बीमारी से घुट - घुट कर मर रही है। बेटी अपाहिज की जिंदगी जी रही है मर - मर कर। माँ - बापू परलोक सिधार गये है। इनके दोनों भाई अपने - अपने परिवारों के साथ सुख की जिंदगी जी रहे है। श्रीधर के मन में एक अन्तर्द्वन्द्व चल रहा है। कैसा घर है यह ? क्या इसी हाहाकार के लिए घर होता है ? लेकिन इस हाहाकार का दायित्व किस पर ? हमारा पुरूषार्थ, आदर्श, कर्म सब जब झूठे पड़ जाये तो व्यक्ति क्या करें?ÓÓ17
यह प्रश्न केवल श्रीधर से जुड़ा हुआ नहीं है बल्कि ये हमारे समाज, संस्कृति और आदर्शो से भी जुड़ी हुई है। किताबों में पढ़ी हुई जिन आदर्शो की बातों को लेकर श्रीधर जिस सच्चाई, जीवन मूल्यों के लिए लड़ता है और अपना सब कुछ गँवा बैठता है, वह उन आदर्शो की वास्तविक जीवन में कहीं कोई मेल नहीं पाता। चारो - ओर विरोधाभास की स्थिति दिखाई देती है, और अंत में वह सब कुछ हार जाता है।
सरो की बीमारी अंतिम पड़ाव में पहुँच चुका है! श्रीधर चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहा है और एक दिन सरों भी उन आदर्शो की भेंट चढ़ जाती है, उनकी मृत्यु हो जाती है - लेकिन देखा जाये तो क्या सरो आज पहली बार मरी है ? नहीं, वह तो जीवन में कई मौतें मरी - कभी पति के वियोग में, कभी बच्चो की लाचारी में, लेकिन हमें केवल एक बार का मरना ही दिखाई दिया, और यही अंतिम था। कान्ता ने सरो को कैसा अंतिम यात्रा के लिये सजाया था, हाथ - पैरों में मेंहदी, महावर लगायी थी, बाल काढ़े थे। माँग और टीका कैसे सुलग पड़े थे ..... बस्ती के इस एकमात्र पथ को साक्षी बना वह पालकी में बैठकर आई थी और आज अपनी देह से उत्पन्न प्रजा के बीच उसी पथ से सबको बंधु बना लौट गयी है।ÓÓ18
हमारी भारतीय संस्कृति, हमारे लोक जीवन में मृत्यु संस्कार की जो परंपरा है उसी का निर्वाह करते हुए सरो को भी अंतिम विदाई दी गई।
डॉ. गोपाल राय लिखते है - ÓÓ यह पथ बन्धु थाÓÓ केवल एक ईमानदार आदमी की पराजय गाथा नहीं है, इसके साथ ही भारतीय नारी की करुणा से भरी नियति कथा भी है। इसकी एक प्रमुख पात्र सरो (सरस्वती) मध्यवर्गीय परिवारों की उस बहू का प्रारूप है जो परिवार के सदस्यों द्वारा अनेक प्रकार से पीड़ित, अपमानित और शोषित है ..... इस प्रकार नरेश मेहता ने मध्यवर्गीय परिवारों में नारी की दुर्भाग्यपूर्ण नियति का अत्यंत यथार्थ और करुण चित्र प्रस्तुत किया है।ÓÓ19
नरेश मेहता ने ÓÓ यह पथ बन्धु थाÓÓ उपन्यास के माध्यम से परिवार में उभरने वाले मूल्यों की टकराहट, संबंधों की विच्छिन्नता, आदर्शो एवं सिद्धांतो के गिरते हुए मूल्य, परायेपन का बोध, साथ ही साथ लोक संस्कृति एवं लोक जीवन से जुड़े अनेक संस्कारों एवं पर्वों को बड़ी ही मार्मिकता के साथ उभारा है।
डॉ. रामदरश मिश्र के अनुसार -ÓÓ यह उपन्यास अनुभवों का उपन्यास है। मध्यवर्ग के एक ईमानदार व्यक्ति के अनुभवो का इतिहास। लेकिन इस व्यक्ति का अनुभव केवल अपने भीतर से नहीं गुजरता बल्कि विराट परिवेश के बीच से गुजरता है। इसलिए इसमें एक साथ बड़े प्रमाणिक रूप में व्यक्ति का भी अनुभव गुजरता है। और समाज का भी। सामाजिक जीवन के जिन सत्यों को लिया गया है वे फारमूलें नहीं मालूम पड़ते बल्कि अनुभव मालूम पड़ते है।Ó गोदानÓ का निम्न वर्गीय होरी अपने समूचे अनुभव में जितना प्रमाणिक है, मध्यवर्गीय श्रीधर भी उतना ही प्रमाणिक है। होरी को घेरने वाले परिवेश का स्वरूप थोड़ा दूसरा है, श्रीधर को घेरने वाला परिवेश कुछ दूसरा। दोनों अपनी - अपनी तरह से टूटते और बिखरते है।Ó यह पथ बन्धु थाÓ गोदान के समान अपने यथार्थ की प्रमाणिकता के कारण ही विशिष्ट हैं। कहीं - कहीं तो गोदान में भी फारमूलें है परन्तुÓ यह पथ बन्धु थाÓ अपनी विराट काया में कहीं भी अनुभव के पथ से नहीं हटता।ÓÓ20
इस प्रकारÓ यह पथ बन्धु थाÓ के माध्यम से लेखक ने जीवन के अनेक मानवीय पक्षों एवं विसंगतियों को इसÓ औपन्यासिक कथाÓ में समाहित करके जीवन को एक नयी मानवीय दृष्टि प्रदान करने का अथक प्रयास किया है, जिसमें वे पूर्णत: सफल भी हुए है।
संदर्भ ग्रंथ:
1. मेहता, नरेश ÓÓ यह पथ बन्धु थाÓ लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण - 1982
2. वहीं, पृष्ठ - 98
3. वहीं, पृष्ठ - 511
4. वहीं, पृष्ठ - 519
5. वहीं, पृष्ठ - 519
6. वहीं, पृष्ठ - 520
7. वहीं, भूमिका
8.  वहींं
9. राय, डॉ. विद्याशंकर ÓÓआधुनिक हिन्दी उपन्यास और अजनबीपनÓÓ पृष्ठ - 105 सरस्वती प्रकाशन मंदिर, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण - 1981
10. मिश्र, डॉ. रामदरश Óहिन्दी उपन्यास: एक अंतर्यात्राÓÓ, पृष्ठ - 142, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण - 1968
11. मेहता, नरेश, ÓÓयह पथ बन्धु थाÓ पृष्ठ - 324, लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद,
द्वितीय संस्करण - 1982
12. वहीं, पृष्ठ - 328
13. वहीं, पृष्ठ - 460
14. वहीं, पृष्ठ - 471
15. वहीं, पृष्ठ - 515
16. वहीं, पृष्ठ - 488
17. वहीं, पृष्ठ - 573
18. वहीं, पृष्ठ - 591
19. राय, डॉ. गोपाल ÓÓहिन्दी उपन्यास का इतिहासÓÓ, पृष्ठ - 253, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली,
 चौथी आवृत्ति - 2014

हिन्दी विभाग
इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय (खैरागढ़)
जिला-राजनांदगांव (छ.ग.)
मो0 - 9575229842

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