इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

बुधवार, 16 मई 2018

लोकतंत्र

चन्‍द्रेश कुमार छतलानी

आम बजट के सत्र के बाद लोकतांत्रिक सरकार ने लोकतंत्र के एक नये तरीके इन्टरनेट से बजट पर एक सर्वे द्वारा जनता की राय मांगी। कोई भी उसे खोलता तो सबसे पहले लिखा मिलता - आपके अनुसार बजट कैसा है ? जिसके तीन विकल्प थे - सर्वमान्य, औसत - मान्य और अमान्य। जो कोई प्रथम दो विकल्प में से कोई एक चुनता, नाम पता और टिप्पणी पूछी जाती, लेकिन यदि कोई अंतिम विकल्प को चुनता तो उससे पूछा जाता - इसका उत्तरदायी कौन है? इसके दो विकल्प थे - सरकार और जनता। जिस - जिसने जनता को चुना उन्हें एक अमान्य बजट का दोषी मानकर दण्डित किया गया और जिन्होंने सरकार को चुना उन्हें झूठ बोलने के लिए ....?

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