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बुधवार, 23 मई 2018

मुठि़ठयां

दीप्ति शर्मा

बंद मुठ़ठी के बीचों - बीच
एकत्र किये स्मृतियों के चिन्ह
कितने सुन्दर जान पड़ रहे हैं
रात के चादर की स्याह
रंग में डूबा हर एक अक्षर
उन स्मृतियों का
निकल रहा है मुठ़ठी की ढीली पकड़ से
मैं मुठ़ठीयों को बंद करती
खुले बालों के साथ
उन स्मृतियों को समेट रही हूँ
वहीं दूर से आती फीकी चाँदनी
धीरे - धीरे तेज होकर
स्मृतियों को देदीप्यमान कर
आज्ञा दे रही हैं
खुले वातावरण में विचरों
मुठ़ठीयों  की कैद से बाहर
और ऐलान कर दो
तुम दीप्ति हो, प्रकाशमय हो
बस यूँ ही धीरे - धीरे
मेरी मुठ़ठीयां खुल गयीं
और आजाद हो गयीं स्मृतियाँ
सदा के लिये ...।

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