इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

बुधवार, 16 मई 2018

आत्‍मग्‍लानि

दीपक पाण्‍डेय

सुलतान शहर का बड़ा व्यापारी है। पांच वक्त का नमाजी धार्मिक व्यक्ति। अबकी बार अपने पिता को हज भेजना चाहता है परन्तु वीज़ा मिलने में कुछ कठिनाई हो रही है, अत: वह शहर के नेता के पास गया, सिफारिश के लिए। नेता जी ने प्यार से घर बैठाया खैरियत पूछी कारण बताने पर नेता जी बोले कि तुम तो जानते ही हो दूसरी पार्टी का राज है, हमारे एक - एक काम पर सियासत की नजर है। यह काम मुश्किल है यह सुनते ही सुलतान के अब्बा भड़क उठे बोले - बहुत देखा तुमको, तुम्हारे एक इशारे पर हमारे लोग पैसा देते हैं। जरुरत पड़ने पर दंगे भी कराये जाते हैं और आज तुम हमारा काम नहीं करोगे। अब हम यहां एक पल भी नहीं रुकेंगे। इतना सुनते ही नेता जी मुस्कराते हुए बोले - चचा नाराज मत हो, और एक फोन लगाया गया परन्तु यह क्या ये फोन तो दूसरी पार्टी के उस कद्दावर नेता को था जिसके एक भाषण पर सांप्रदायिक दंगे हो जाया करते हैं इन दोनों में इतने प्रगाढ़ सम्बन्ध ? काम हो चुका था। सुलतान जानता था उसका काम हो चुका था फिर भी वह खुश नहीं था। वह जानता था, ये दोनों अपने - अपने धर्मों के वही नेता थे पिछली बार जिनके एक भाषण से दंगे भड़क उठे थे और सैकङों़ लोगों की जानें गयी थी इन दोनों में इतने प्रगाढ़ सम्बन्ध। वह सोच भी नहीं सकता था हालांकि वह जानता था दूर के रिश्ते में इन दोनों की वैवाहिक सम्बन्ध होने से रिश्तेदारी भी थी। वह सोच रहा था, जिस सियासत से वो आज तक नफरत करता था कितना भाईचारा है इन लोगों में, आपस में और यहां तक की रिश्तेदारी भी बस दुनिया की नजर में वे विरोधी हैं और हम आम आदमी इनके एक इशारे पर कत्लेआम को तैयार हो जाते हैं। आज काम हो जानें पर भी वह भारी मन से वापस लौटा उसका मन अपने स्वयं के प्रति आत्मग्लानि से भरा हुआ था।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें