इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

बुधवार, 16 मई 2018

हम नहीं सुधरेंगे

अम्‍बरीष श्रीवास्‍तव

बिरादरी में ऊँची नाक रखने वाले, दौलतमंद पर स्वभावत: अत्यधिक कंजूस, सुलेमान भाई ने अपने प्लाट पर एक घर बनाने की ठानी। मौका देखकर इस कार्य हेतु उन्होंने एक परिचित के यहाँ सेवा दे रहे आर्कीटेक्ट से बात की। आर्कीटेक्ट नें उनके परिचित का ख्याल करते हुए बतौर एडवांस, जब पन्द्रह हजार रूपये जमा कराने की बात कही तो सुलेमान भाई अकस्मात ही भड़क गए, और बोले - मैं पूरे काम के किसी भी हालत में एक हजार से ज्यादा रूपये नहीं दूंगा! यह सुनकर वह आर्कीटेक्ट वापस चले गए। इधर सुलेमान भाई ने भी सस्ते में ही, एक दो मंजिला शानदार घर बनवा डाला। इस बात को एक महीना भी नहीं बीता, तभी किसी व्यापारिक कार्यवश दिल्ली प्रवास के दौरान, सुलेमान भाई को खबर मिली कि उनके शहर में एक तेज भूकंप आया है। हड़बड़ी में गिरते - पड़ते किसी तरह जब वे अपने घर पहुँचे, तो उन्होंने पाया कि परिचित का घर तो सीना ताने उनके सामने खड़ा था पर मलवे की शक्ल में तब्दील उनके सपनों का घर, सारे परिवार को स्वयं में दफन किये हुए, उनकी कंजूसी को लगातार मुँह चिढ़ा रहा था। यह देखकर वे विक्षिप्त से हो उठे और अपना सिर जमीन पर पटकने लगे।
अकस्मात कन्धे पर किसी का सांत्वना भरा हाथ पाकर, उन्होंने आँसुओं से भरा हुआ स्वयं का चेहरा ऊपर उठाया, तो पाया कि वही आर्कीटेक्ट, स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद से, मलवे से सुरक्षित निकाली हुई, उनकी तीन वर्षीय जीवित पोती को गोद में उठाये हुए, उन्हें सकुशल सौंप रहे थे ... जिसे उन्होंने एकबारगी तो अपने कलेजे से लगा लिया किन्तु अगले ही पल उसे गोद से उतारा और आसमान की तरफ  हाथ उठाकर बोले ऐ पाक परवरदिगार! ये क्या किया! इससे तो अच्छा था मेरे फरीद को बचा लेते ...आखिर मेरा वंश तो चलता !

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